छठ पूजा क्या है और क्यो मनाई जाता है ? कथा और पूजा विधि | Chhathi Puja kya hai ?

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छठ पूजा क्या है ? |  Chhathi Puja kya hai ? : हमारे देश में पर्व एक संस्कृति का अहम हिस्सा रहे हैं और आज भी हैं क्योंकि हमारे देश में धर्म और संस्कृति को विशेष दर्जा दिया गया जिसमें हर प्रकार के धार्मिक सामाजिक और अलग-अलग संप्रदायों के लोग अपने अपने धर्म समाज और संप्रदाय से जुड़कर अपनी सामाजिक परंपराओं का निर्वहन करते हुए पर्वों को मनाते चले आए हैं।

हमारे समाज में आज भी पर्वों को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। कुछ ऐसे पर्व जो एक समाज में तथा कुछ ऐसे पर्व जो संपूर्ण देश में मनाए जाते हैं। हमारे देश में अलग-अलग त्योहारों को पर्वों को अपने अपने समाज के हिसाब से मनाया जाता है।

हमारे देश में विभिन्न धर्मों संप्रदाय और समाज के लोग अपने अपने सामाजिक परंपरा के हिसाब से पर्वों को एक अलग पहचान देते हुए मनाते आए हैं। जैसे होली दीपावली दशहरा आदि सामाजिक पर्व है जो संपूर्ण देश एक साथ मिलकर मनाता हैं।

लेकिन कुछ पर्व ऐसे होते हैं जो केवल एक समुदाय समाज में अपनी पारंपरिक रीति-रिवाजों के हिसाब से मनाते आए हैं। ऐसे में हमारे देश में एक पर्व मनाया जाता है जिसका नाम छठ पूजा जाना जाता है। छठ पूजा की शुरुआत कब और कैसे प्रारंभ हुई इसके विषय में हमारी पौराणिक कथाओं में बहुत से प्रसंग मिलते हैं । यह पर्व दो लोगों से जुड़ा हुआ पर्व है पहला सूर्य देवता और दूसरा छठी मैया से जुड़ा हुआ।

लेकिन यह पर्व एक साथ ही मनाया जाता है। यह पर्व बहुत ही विधि विधान के साथ मनाया जाता है। इस पर्व को साल में दो बार मनाया जाता है एक चैत्र माह शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है दूसरा कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है।

इस त्यौहार से जुड़ी कुछ खास बातें जैसे सूर्य पूजा उषा प्रकृति वायु जल मां छठी को समर्पित करने के लिए तथा उनसे अपने जीवन में आशीर्वाद की कामना प्राप्त करने के लिए बड़े ही धूमधाम से पूजा की जाती है।

यह त्यौहार मुख्य रूप से 4 दिनों तक बहुत ही कठिन अनुष्ठान करते हुए मनाया जाता है इस त्यौहार में उपवास के समय कुछ भी नही खाया जाता है और पानी भी नही पिया जाता है तथा लंबे समय तक पानी में खड़े होकर को सूर्य भगवान को पानी से अर्घ्य दिया जाता है।

अब बात यह है कि यह त्यौहार क्यों मनाया जाता है? इस विषय में हमारी पौराणिक कथाओं में कुछ इस प्रकार के तथ्य मिलते हैं जो छठ पूजा से जुड़े हुए हैं। अब हम आइए अपने लेख के माध्यम से छठ पूजा का पूरा विस्तृत वर्णन करते हैं कब क्यों और कैसे मनाते हैं ।इसके विषय में विस्तार पूर्वक चर्चा करेंगे.

छठ पूजा क्या है ? और क्यो मनाई जाता है उससे प्रचलित कथा | Chhathi Puja ke Vrat ki katha

हमारे देश में पर्व एक संस्कृति का अहम हिस्सा रहे हैं और आज भी हैं क्योंकि हमारे देश में धर्म और संस्कृति को विशेष दर्जा दिया गया जिसमें हर प्रकार के धार्मिक सामाजिक और अलग-अलग संप्रदायों के लोग अपने अपने धर्म समाज और संप्रदाय से जुड़कर अपनी सामाजिक परंपराओं का निर्वहन करते हुए पर्वों को मनाते चले आए हैं.

हमारी पौराणिक कथाओं में यह है बताया जाता है कि सर्वप्रथम इस सृष्टि की अधिष्ठात्री मां प्रकृति ने अपने शरीर को 6 भागों में विभाजित करके छठे अंश को देवी के रूप में प्रकट किया था और यह देवी भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री के रूप में जानी जाती हैं इस देवी को बच्चों की रक्षा हेतु भी माना जाता है  .

क्योंकि पौराणिक कथाओं में यह प्रमाण दिया गया है कि बच्चा जब घर में जन्म लेता है तो जब बच्चा 6 दिन का हो जाता है तो बच्चे की मंगल कामना के लिए विधि विधान से उस दिन को मनाया जाता है और आज भी उसकी षष्ठी के रूप में उस दिन को बड़ी धूमधाम से मनाते है.

छठ पूजा व्रत की दूसरी कथा | Chhathi Puja Vrat ki dusri Katha

छठ पूजा के व्रत की कथा का वर्णन महाभारत में भी मिलता है बताया गया है कि जब युधिष्ठिर जुए में अपना पूरा राज पाठ हार गए थे.

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तब अपने राजपाट को वापस पाने के लिए द्रौपदी ने छठ पूजा का व्रत मां छठ देवी से अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए बड़ी धूमधाम से किया था। और इस तरह से द्रोपदी की छठ पूजा आराधना से उनकी मनोकामना पूर्ण हुई और उनको उनका राजपाट वापस मिल गया था.

छठ पूजा व्रत की तीसरी कथा राजा प्रियवंद की

छठ मैया की पूजा से जुड़ी एक क​था राजा प्रियवंद की है, जिन्होंने सबसे पहले छठी मैया की पूजा की थी। छठ पूजा की कथा का आरंभ पौराणिक कथाओं में बताया जाता है कि राजा प्रियंवद के कोई संतान नहीं थी।जिसके कारण उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए एक पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया था और उस दौरान यज्ञ में आहुति देने के लिए खीर बनवाई गई थी।वही खीर राजा प्रियवद ने जब अपनी पत्नी को खिलाया था तो उनको एक पुत्र की प्राप्ति हुई थी।

भाग्य बस जब पुत्र का जन्म हुआ तो वह मृत पाया गया। इस तरह से राजा शंकित होकर जब पुत्र का शव लेकर शमशान गए तो वहां पर उन्होंने पुत्र वियोग में अपने भी प्राण त्यागने की इच्छा व्यक्त की। तभी वहां पर ब्रह्मा की पुत्री देवसेना ने प्रकट होकर राजा से कहा .

हे राजन मैं सृष्टि के छठे अंश से उत्पन्न हुई ब्रह्मा की पुत्री हूं । मेरा नाम षष्ठी है इसलिए तुम जाकर मेरी पूजा करो और इसका प्रचार-प्रसार भी करो। यह सुनकर राजा प्रियंवद घर आकर मां षष्ठी का विधि विधान से पूजन किया , और उसके बाद उनको एक पुत्र की प्राप्ति हुई । यह पूजा जिस दिन किया था उस दिन कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी थी। तभी से छठ पूजा का प्रचलन हुआ।

चौथी सूर्य पूजा की कथा भगवान श्रीराम और सीता ने किया

एक छठ पूजा की पौराणिक कथा में यह है की जब भगवान राम रावण को मारकर अपने निजधाम अयोध्या आए थे तो अयोध्या में राम राज्य की स्थापना करने के लिए,

भगवान श्री राम और मां सीता ने मिलकर कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन ही एक उपवास रखकर सूर्य भगवान की आराधना करके पूजा अर्चना की थी बताया जाता है कि तभी से इस छठ पूजा का विशेष महत्त्व है।

सूर्य पूजा की शुरुआत कर्ण के द्वारा

पौराणिक कथाओं में महाभारत के एक महान और कुशल नेतृत्व करने वाले दानवीर कर्ण से भी सूर्य की पूजा से जुड़ा हुआ प्रसंग मिलता है।कहा जाता है  .

कि कर्ण सूर्य का पुत्र होने के कारण यह भगवान सूर्य की उपासना और पूजा पाठ करके प्रतिदिन सूर्य को नदी में जाकर स्नान करके अर्घ्य दिया करते थे तभी से सूर्य भगवान की पूजा की जाती है।

छठ पूजा व्रत करने की विधि | Chhathi Puja Vrat karne ki vidhi

1- छठ मैया की पूजा कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष षष्ठी को की जाती है इस पूजा में ईट और मिट्टी से बनी छठ मैया को स्थापित करके पूजा की जाती है। इस पूजा में सबसे पहले ठेकुआ और कसार को बनाया जाता है .

और उसको एक पूजा का डाल लेकर उसमें पूजा की सामग्री रखकर किसी नदी या तालाब के पास जाकर स्नान करके डूबते हुए सूर्य को अर्घ देकर पूजा की जाती है इस व्रत में जब अर्घ्य दिया जाता है तो उस अर्घ्य के साथ दूध और गंगाजल का भी अर्घ्य दिया जाता है।

2. छठ पूजा का व्रत धारण करने के लिए सबसे पहले मिट्टी के चुल्हा जलाकर गुड़ और चावल की खीर बनाकर छठ मैया का भोग लगाते हैं उसके बाद उस प्रसाद को जो महिला व्रत करती है. वह इसी खीर को खाकर छठ मैया के पूजा का व्रत जितने दिन तक चलता है उतने दिन तक निराहार रहकर पालन करते हुए प्रतिदिन शाम को नदी पर में खड़े होकर सूर्य भगवान को अर्घ्य देती है ।

3. इस पूजा में लगने वाली सामग्री बांस की 3 बड़ी टोकरी, बांस या पीतल के बने 3 सूप, थाली, दूध और ग्लास, चावल, लाल सिंदूर, दीपक, नारियल, नाशपती, बड़ा नींबू, शहद, पान, साबुत सुपारी, कैराव, कपूर, चंदन हल्दी, गन्ना, सुथनी, सब्जी और शकरकंदी और मिठाई प्रसाद के रूप में ठेकुआ, मालपुआ, खीर-पुड़ी, सूजी का हलवा, चावल के बने लड्डू है.

आदि को लेकर एक बांस से बना हुआ डाल लेकर उसने सभी सामग्री रखकर नदी के पास दीपक जलाकर सूर्य को नदी में खड़े होकर अर्घ्य देते हैं।

छठ पूजा करने का महत्व | Chhathi Puja karne ka mahatva

छठ पूजा क्यों की जाती है ?इस कथा का प्रारंभ कैसे हुआ ? इसके विषय मे विस्तृत जानकारी देने के बाद अब हम छठ पूजा के विशेष महत्व को भी समझेंगे कि छठ पूजा करने का क्या महत्व है ? सूर्य और छठी मैया के लिए यह व्रत किया जाता है इस व्रत का सबसे ज्यादा महत्व इस बात का है यह व्रत सूर्य भगवान उषा प्रकृति जल और वायु को समर्पित किया जाता है ।

यह व्रत निसंतान लोग संतान सुख के लिए करते हैं इसका व्रत संतान की रक्षा और जीवन को खुशहाल बनाने के लिए करना महत्वपूर्ण होता है । यह संतान की प्राप्ति जीवन को खुशहाल और परिवार को सुख समृद्धि से परिपूर्ण करने की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होता है.

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