Kartik purnima ki katha | कार्तिक पूर्णिमा की कथा : हेलो दोस्तो नमस्कार आज मैं इस लेख के माध्यम से आप लोगों को सम्पूर्ण kartik purnima ki katha बताऊंगी, ताकि आप लोग kartik purnima ki katha का क्या महत्व है ? यह समझ सकें.
क्योंकि हिंदू धर्म में कार्तिक महीने में पड़ने वाली कार्तिका पूर्णिमा को एक पर्व का महत्त्व प्राप्त है. इस दिन गंगा स्नान और भगवान विष्णु की पूजा अर्चना का विधान है, इस दिन खास करके जप, तप और दान का विशेष महत्व बताया जाता है.
| नई/लेटेस्ट जानकारी टेलीग्राम चैनल ज्वाइन करे |
| ऑफिसियल टेलीग्राम ग्रुप ज्वाइन करे |
| लेटेस्ट जानकारी के लिये हमे WhatsApp पर Subscribe करे |
| फ़ोन नंबर के लेख के लिये whatsapp पर ज्वाइन करे |
ज्योतिष शास्त्र का कहना है कि जब कार्तिक पूर्णिमा, कार्तिक नक्षत्र में प्रवेश करती है. तब इसे कार्तिक नक्षत्र कहा जाता है, इस दिन बड़े-बड़े तीर्थ स्थलों पर दर्शन प्राप्त करने तथा गंगा नदी में स्नान करने का विधान है मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस दिन गंगा नदी में स्नान करता है. वह पूरे साल गंगा स्नान करने के बराबर फल मिलता है.

कार्तिक पूर्णिमा के दिन को इतना महत्व इसलिए प्राप्त है क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर के विनाश के लिए अपने दशावतार में से मत्स्य अवतार का रूप धारण किया था, जिसके कारण भगवान विष्णु को त्रिपुरारी के नाम से भी पूजा जाता है.
मान्यता है कि इस दिन कार्तिक पूर्णिमा की कथा सुनने से पुण्य की प्राप्ति होती है और जिससे हमें मृत्यु के पश्चात स्वर्ग लोक में स्थान प्राप्त होता है .
इसके अलावा भी कई सारे लाभ मिलते हैं. जिनके विषय में हम इस लेख में सबसे अंत में बताने का प्रयत्न करेंगे. लेकिन उससे पहले संपूर्ण कार्तिक पूर्णिमा की कथा बताएंगे. ऐसे में अगर आप लोग कार्तिक मास की पूर्णिमा कथा से परिचित होना चाहते हैं तो इस लेख को शुरू से अंत तक अवश्य पढ़ें.
कार्तिक पूर्णिमा की कथा | Kartik purnima ki katha
यहां पर कार्तिक पूर्णिमा की कथा एक विस्तार से बताई जा रही है. कार्तिक पूर्णिमा की कथा को लेकर पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि तारकासुर नाम का एक राक्षस का जिसके, तारकाक्ष, कमलाक्ष, और विदयुनमली नाम के पुत्र थे.
भगवान शिव के सबसे बड़े पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर राक्षस का वध कर दिया इस खबर को तारकासुर के तीनों पुत्रों ने सुना तो वह अत्यंत दुखी हुए फिर उन तीनों ने मिलकर ब्रह्मा जी से वरदान मांगने हेतु कठिन तपस्या में लीन हो गए. तपस्या करने के पश्चात ब्रह्मा जी उन तीनों की तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन दिया और बोले मैं आप तीनों की तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूं और आप लोग हमसे जो वर चाहे मांग सकते हैं.

ब्रह्मा जी के दर्शन पाकर तारकासुर के तीनों पुत्र बहुत खुश हुए उन्होंने अपनी तपस्या पूर्ण होने पर ब्रह्मा जी से अजर-अमर होने का वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्मा ने उन लोगों से कोई और वर मांगने की इच्छा जताई कहा की आप लोग इस वरदान को छोड़कर और कोई दूसरा वरदान मांग लो.
ब्रह्मा जी की इस बात को सुनकर तारकासुर के तीनों पुत्र ने इस बार ब्रह्मा जी से कहा आप हम तीनो भाइयों के लिए तीन ऐसे अलग-अलग नगरों का निर्माण कीजिए. जिन पर बैठकर हम लोग पृथ्वी, आकाश सभी का भ्रमण आसानी से कर सकें और हम 1000 वर्षों में केवल एक बार कुछ क्षणों के लिए ही तीनो नगर एक सीध में आएं।
उस समय अगर कोई एक ही बाण से उन तीनों नगरों का नाश कर सके. तभी हमारी मृत्यु संभव हो ऐसा वरदान तारकासुर के तीनों पुत्रों ने ब्रह्मा जी से मांगा.
ब्रह्मा जी ने इस बार वरदान दे दिया और वरदान पाकर तारकासुर के तीनों पुत्र बहुत ही प्रसन्न हुए, फिर ब्रह्मा जी ने एक मय दानव की उत्पत्ति की और उसे उन तीन नगरों का निर्माण करने को कहा। ब्रह्मदेव की आज्ञानुसार मय दानव ने विद्युंमाली के लिए पृथ्वी पर लोहे का नगर और कमलाक्ष के लिए आकाश में चांदी का और तारकाक्ष के लिए स्वर्ग में सोने की नगरी का निर्माण किया.
जो त्रिपुरारी कहलाए. तारकासुर के तीनों पुत्रों को उनके वरदान के मुताबिक अलग-अलग नगर प्राप्त हो गए तो वह तीनों नगरों (मतलब तीनो लोक पर) अपना शासन करने लगे. वे तीनों नगर इतने शक्तिशाली थे कि विश्व का कोई भी अस्त्र उनमें से एक भी नगर को अकेले नहीं भेद सकता था, फिर तीनों को एक साथ भेदने के विषय में कौन सोच सकता था ?

तारकासुर के तीनों पुत्र अपने आप को अमर समझ कर पूरी सृष्टि में त्राहि-त्राहि मचाने लगे। ऐसे 999 वर्ष बीत गए और 1000वां वर्ष आने को हुआ और जब वो नगर एक सीध में मिलेंगे और तभी उनका विनाश संभव था. जब उन तीनों के विनाश का समय पास आया. तब समस्त देवता, देवराज इंद्र के नेतृत्व में ब्रह्मा जी के पास पहुंचकर, ब्रह्मा जी के सामने तारकासुर के तीनों पुत्रों के अत्याचार से छुटकारा पाने की प्रार्थना की.
समस्त देवताओं की प्रार्थना सुनकर ब्रह्मा जी ने सभी देवताओं को नारायण जी के पास लेकर पहुंच गए, फिर ब्रह्मा सहित समस्त देवी-देवताओं ने नारायण भगवान से उन तीनों दुष्टों का वध करने को निवेदन किया.
नारायण जी के इस निवेदन को सुनकर विष्णु जी ने कहा कि ब्रह्म आपके वरदान के मुताबिक तीनों असुर अजेय हैं, जिसके चलते हम अपने सुदर्शन चक्र से एक-एक करके तीनों को नष्ट कर सकते हैं , किंतु सुदर्शन एक साथ उन तीनों को नष्ट कर सके, इसमें मुझे शंका है, ये महान सुदर्शन चक्र भी मुझे स्वयं महादेव की तपस्या करने पर उनसे ही प्राप्त हुआ है.
इसलिए हम सभी को भगवान शिव के पास जाकर इस समस्या का समाधान करने की प्रार्थना करनी चाहिए. विष्णु भगवान की इस बात से ब्रह्मा जी और समस्त देवी-देवता सहमत हुए और फिर विष्णु जी के पक्ष में सभी देवी-देवता भगवान शिव के पास पहुंचे.
शिव जी के पास पहुंचने के बाद ब्रह्मा, विष्णु सहित समस्त देवी-देवताओं ने तारकासुर के तीनों पुत्रों के विनाश हेतु भगवान शिव से प्रार्थना की, देवों की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव ने नंदी के नेतृत्व में देवताओं को उन तीनों दैत्यों से युद्ध करने को भेजा, उस युद्ध में नंदी ने अपने पराक्रम से विद्युंमाली का शिरोच्छेद भी कर डाला, किंतु परमपिता के वरदान के कारण वो पुनः जीवित हो गया .
तब समस्त देवता उस युद्ध में पराजित होकर शिव के पास वापस आ गए और इस बार सभी देवी-देवता ने भगवान शिव से कहा कि हे प्रभु इस बार आप ही उनके उनका विनाश करने के लिए जाए. ऐसी हम सबकी प्रार्थना है.
सभी देवी-देवताओं की प्रार्थना को सुनकर भगवान शिव सोच में पड़ गए. तब ब्रह्म देव बोले हे शंकर ! वरदान के अनुसार वो समय निकट है. जब वो तीनों नगर एक रेखा में आयेंगे, अगर उस समय आपने उनका नाश नहीं किया, तो हमें पुनः 1000 वर्षों तक प्रतीक्षा करनी होगी.
ब्रह्मा जी की बात को सुनकर भगवान शिव बोले परमपिता आपकी बात तो सही है. अगर इस बार का समय निकल गया तो 1000 वर्ष तक फिर से प्रतीक्षा करनी होगी. इसीलिए हम सबको मिलकर कोई ऐसा उपाय सोचना होगा. जिससे हम एक बार में ही उनका वध कर सके.
तब सभी देवी-देवताओं ने मिलकर, एक दिव्य रथ का निर्माण किया. जो पूर्ण रूप से सोने की थी तथा जिसमें हर एक चीज देवताओं से बनी थी.

जैसे, चंद्रमा और सूर्य की मदद से रथ के पहिए बनाए गए थे, इंद्र ,वरूण, यम और कुबेर रथ के चल घोड़े बने थे. हिमालय धनुष बने और शेषनाग प्रत्यचा बने , भगवान शिव धनुष की बात बने और धनुष की नोक अग्निदेव बने. इस तरह से एक परत का निर्माण किया गया. जिस पर भगवान शिव सवार हुए .
जब भगवान शिव रथ पर सवार होकर उन तीनों असुरो के नगर के पास जा पहुंचे. उस समय संयोगवश तीनों नगर एक ही रेखा में बने हुई थे.
तीनों नगरों को एक ही रेखा में देखकर भगवान शिव ने अपना रौद्र रूप धारण किया और फिर हिमालय स्वरूप धनुष पर विष्णु स्वरूप बाण का साधन किया. बाण के साधन करते ही शिवाजी के क्रोध से तीनों नगर जलने लगे. शिवाजी के उस दिब्य बाण से तारकासुर के तीनों पुत्रों को मुक्ति प्राप्त हो गई.
तारकासुर के तीनों पुत्रों को मोक्ष प्राप्ति के बाद पृथ्वी लोक और स्वर्ग पर हर जगह सब कुछ पहले जैसा हो गया और फिर से खुशहाली छा गई. इस तरह से भगवान शिव को त्रिपुरारी नाम प्राप्त हो गया. मित्रों यही है. kartik purnima ki katha जिसको सुनने से भगवान शिव और विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है जिससे जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और हर एक समस्या से निपटने की सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है.
FAQ : kartik purnima ki katha
तारकासुर का वध कौन करता है ?
तारकासुर राक्षस का वध भगवान शिव के कार्तिकेय के द्वारा हुआ था.
भगवान शिव के सबसे बड़े पुत्र कौन थे ?
पौराणिक कथाओं के अनुसार कार्तिकेय भगवान शिव और माता पार्वती के सबसे बड़े पुत्र हैं.
शिव भगवान का बाप कौन है ?
हिंदू धर्म और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव अनादि और अजन्मे हैं, अर्थात उनका कोई माता-पिता नहीं है। वे स्वयं ही इस सृष्टि के मूल कारण हैं।
निष्कर्ष
प्रिय मित्रों जैसा कि आज हमने इस लेख में आप सभी लोगों को kartik purnima ki katha के विषय में बताया है. अगर आप लोगों ने इस लेख को शुरू से अंत तक पढ़ा होगा, तो आप लोगों को कार्तिक माह की संपूर्ण कथा क्या है ? इस विषय पर अच्छी खासी जानकारी प्राप्त हो गई होगी.
अब आप लोग जान गए होंगे कि कार्तिक माह की कथा सुनने का कितना महत्व है ? तो मित्रों हम उम्मीद करते हैं. आप लोगों को हमारे द्वारा बताई गई जानकारी पसंद आई होगी, साथ में उपयोगी भी साबित हुई होगी.







