खाटू श्याम का इतिहास : कौन है बाबा खाटू श्याम जाने असली कहानी | Khatu shyam ka itihaas

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खाटू श्याम का इतिहास | Khatu shyam ka itihaas : राजस्थान के सीकर जिले में खाटू श्याम का हजारों साल पुराना एक मंदिर है जहां आज हजारों की संख्या में लोग दर्शन हेतु पहुंचते हैं और खाटू श्याम जी की पूजा करते हैं। लेकिन क्या आप खाटू श्याम का इतिहास जानते हैं ? या खाटू श्याम का इतिहास जानना चाहते हैं?

खाटू श्याम

तो आइए हम आपको यहां पर खाटू श्याम इतिहास बताते हैं। हिंदू धर्म में खाटू श्याम जी का आज बहुत बड़ा महत्व है और हजारों लोग दर्शन करने जाते हैं।

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आज के समय में राजस्थान के सीकर में स्थित खाटू श्याम का मंदिर का निर्माण 1027 ईस्वी में मारवाड़ के रूप सिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कंवर द्वारा बनवाया गया। इस मंदिर में भीम के पौत्र बर्बरीक के सिर की पूजा की होती है। बर्बरीक के धड़ की पूजा हरियाणा के हिसार जिले में एक मंदिर में की जाती है।

खाटू श्याम का इतिहास | Khatu shyam ka itihas

दोस्तों अगर आप खाटू श्याम का इतिहास जानना चाहते हैं तो हमारे इस आर्टिकल में आपको संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है जिससे आपको लगभग खाटू श्याम का संपूर्ण वृतांत मिल जाएगा।

हम सभी महाभारत के युद्ध से परिचित हैं जोकि कौरव और पांडवों के बीच लड़ा गया था और जिसमें श्री कृष्ण जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। कहा जाता है कि जब महाभारत का युद्ध प्रारंभ होने वाला था.

उससे पहले भीम के पुत्र घटोत्कच,घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक थे. जो बहुत ही बलशाली योद्धा थे और ऐसा कहा जाता है कि यह किसी भी युद्ध को एक ही बाण के द्वारा समाप्त कर सकते थे।

khatu shyam

जब महाभारत का युद्ध प्रारंभ होने का समय आया तो घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक को भी यह युद्ध देखने की इच्छा हुई और उसमें सम्मिलित होने की बात किया। जब बर्बरीक महाभारत के युद्ध को देखने के लिए अपनी माता के पास आज्ञा लेने पहुंचे तो उनकी मां ने हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन लिया।

बर्बरीक एक ऐसा महा योद्धा था जो अपने पास तीन बाण रखता था और तीनों बाणों से धरती, आकाश और पाताल को एक साथ नष्ट कर सकता था। इसके साथ-साथ बर्बरीक एक महादानी भी था, तथा अपने द्वारा दिए गए प्रश्नों के प्रति कटिबद्ध रहता था।

मां से आशीर्वाद लेकर वह एक नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर कुरुक्षेत्र की ओर चल पड़ा।

यह बात जब श्रीकृष्ण को पता हुई तो उन्होंने बर्बरीक को रोकने के लिए ब्राह्मण का भेष बनाकर रास्ते में हंसी ठिठोली करते है और बात ही बात में कहा कि आप तो महान योद्धा हैं और तीन बाण से युद्ध समाप्त कर सकते हैं तो भला आप तीन वर्णों से युद्ध में सम्मिलित कैसे हो सकते हैं?

इस बात को सुनकर बर्बरीक ने कहा कि किसी भी शत्रु सेना को परास्त करने के लिए एक ही बाण काफी है और शत्रु सेना को समाप्त करने के बाद हमारा बाण पुनः अपने तरकस में आ जाएगा अगर हम तीनों बाणों का प्रयोग कर देंगे तो समस्त ब्रह्मांड समाप्त हो जाएगा।

खाटू श्याम

जब भगवान श्री कृष्ण ने यह बात सुनी तो उन्होंने इसकी परीक्षा लेने के लिए बर्बरीक को चुनौती दी और कहा कि अगर आप इस पेड़ के सभी पत्तों को भेद कर दिखा दो तो हम आपकी बात स्वीकार कर लेंगे। इतना कहते ही बर्बरीक ने एक बाण निकाला और सभी पत्तों को भेद दिया।

श्री कृष्ण ने बड़ी चतुराई के साथ उस पेड़ के 1 पत्ते को तोड़कर अपने पैर के नीचे दबा लिया था. तब बर्बरीक ने श्री कृष्ण से कहा कि आप अपना पैर हटा दीजिए अन्यथा आपका पैर भी बाण भेद देगा और तब श्रीकृष्ण को अपना पैर हटाना पड़ा उसके बाद बर्बरीक के बाण ने उस पत्ते को भी भेद डाला।

जब भगवान कृष्ण ने इस बात को देखा तो उनको समझ में आया कि अगर ऐसा हुआ तो समस्त ब्रह्मांड विनाश की ओर चला जाएगा ऐसे में श्रीकृष्ण ने उसी वक्त बर्बरीक से कहा कि आप युद्ध में आप किस ओर से सम्मिलित होंगे ऐसा कहने पर बर्बरीक ने कहा !

जो पक्ष कमजोर होगा. उसी पक्ष की ओर से हम युद्ध करेंगे क्योंकि यह वचन हमने अपनी मां को दिया है परंतु श्री कृष्ण यह भी जानते थे कि इस युद्ध में हार कौरवों की होनी है. ऐसे में यदि बर्बरीक को ना रोका गया तो युद्ध के परिणाम विपरीत हो सकते हैं।

अंत में ब्राह्मण रूपी श्री कृष्ण ने बर्बरीक से से कहा कि आप बड़े दानी हैं और हम आपसे दान चाहते हैं बर्बरीक ने बिना सोचे समझे श्रीकृष्ण को दान देने की बात कह दिया और कहा जो भी मांगना हो मांग लीजिए. इस बात पर श्री कृष्ण ने बर्बरीक से उसका शीश मांग लिया।

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जैसे ही बर्बरीक ने इतनी बात सुनी वह अचंभित होकर श्री कृष्ण से कहा कि आप ब्राह्मण नहीं हो, निश्चित ही आप कोई एक असाधारण पुरुष हैं. कृपया अपना वास्तविक रूप दिखाएं।

इस पर श्री कृष्ण ने अपने वास्तविक रूप में आकर बर्बरीक को दर्शन दिया और बर्बरीक ने अपने वचन के अनुसार अपना शीश श्रीकृष्ण को देने से पहले कहा इस प्रकार से शीश मांगने का प्रयोजन क्या था ?

तब श्री कृष्ण ने बर्बरीक से कहा कि युद्ध आरंभ होने से पहले किसी श्रेष्ठ क्षत्रिय का भूमि पूजन के लिए बलिदान करना पड़ता है इसलिए मैंने ऐसा किया। अपना सिर बलिदान करने से पहले बर्बरीक ने श्री कृष्ण से कहा कि हे प्रभु आपने मुझे एक सर्वश्रेष्ठ वीर की उपमा दी है इसलिए मेरी अभिलाषा है कि मैं संपूर्ण युद्ध देख सकूं।

इस पर भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक से कहा कि मैं आपको वरदान देता हूं कि आप संपूर्ण युद्ध देख पाएंगे और उसका शीश युद्ध मैदान के निकट एक पहाड़ी पर रख दिया गया।

जब महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ तो पांडवों में इस बात को लेकर बहस हुई कि युद्ध के विजय का श्रेय किसको जाता है ? जब यह बात श्री कृष्ण से पूछी गई तो श्री कृष्ण ने कहा कि संपूर्ण युद्ध के विजय का श्रेय अगर आप जानना चाहते हैं ? तो यह बात बर्बरीक से पूछी जाए, क्योंकि वह संपूर्ण युद्ध का साक्षी है।

इस बात से सहमत होकर सभी पांडव बर्बरीक के पास पहुंचे और श्री कृष्ण ने बर्बरीक से विजय का श्रेय पूछा तब बर्बरीक ने कहा-इस युद्ध के विजय का श्रेय प्रमुख रूप से श्रीकृष्ण को जाता है, क्योंकि श्री कृष्ण की उपस्थिति और नीतियां इस युद्ध का निर्णायक रहे हैं मैंने देखा है कि युद्ध भूमि श्री कृष्ण का चक्र घूम रहा था और कौरव का वध करता गया तथा महाकाली कृष्ण के आदेशानुसार शत्रु का खून पी रही थी।

Temple mandir

इस बात से सहमत होकर सभी पांडव घर चले आए और उसी समय श्री कृष्ण ने बर्बरीक को महादानी की उपाधि दिया तथा इसके साथ साथ बर्बरीक को वरदान दिया कि कलयुग में तुम श्याम के नाम से जाने जाओगे और तभी से बर्बरीक नाम श्याम हो गया।

युद्ध के पश्चात बर्बरीक के सिर को खाटू नगर राजस्थान के सीकर जिला में दफनाया गया इसीलिए आज वहां खाटू श्याम के नाम से बर्बरीक की पूजा की जाती है कहा जाता है कि उस स्थान पर आज भी एक गाय अपने दूध की धारा बहा रही है।

बाद में खुदाई के दौरान बर्बरीक के सिर को पाया गया जो वहां के एक ब्राह्मण को समर्पित कर दिया गया इसके बाद खाटू नगर के राजा को स्वप्न में मंदिर बनाने की बात आई और उस राजा ने मंदिर का निर्माण करवाया. जहां पर कार्तिक माह की एकादशी के दिन बर्बरीक के सिर को स्थापित कर दिया गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि जो व्यक्ति खाटू श्याम का सच्चे मन और प्रेम से पूजा करेंगे उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी और हर व्यक्ति अपने जीवन में सफल होगा।

FAQ: खाटू श्याम का इतिहास

खाटू श्याम की उत्पत्ति कैसे हुई ?

दोस्तों हम सभी जानते हैं कि महाभारत में जब पांडवों को वनवास हुआ तो वनवास के दौरान भीम की मुलाकात हिडिंबा नामक राक्षस स्त्री से हुआ और उससे विवाह करके उनको 1 पुत्र घटोत्कच हुआ और इन्हीं घटोत्कच के 3 पुत्र हुए जिनमें से प्रथम पुत्र के रूप में बर्बरीक थे।

बर्बरीक अत्यंत बलशाली श्रेष्ठ धनुर्धर था जो केवल 3 बाणों से ब्रह्मांड को नष्ट करने की क्षमता रखता था जब महाभारत के युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण को यह बात पता चली तो उन्होंने उसके शीश को दान मांग लिया परंतु बर्बरीक की इच्छा थी कि वह महाभारत का युद्ध देखें ऐसे में श्रीकृष्ण ने उनकी क्षमता और शक्ति से प्रभावित होकर अपना नाम श्याम दिया और कलयुग में इसी नाम से प्रसिद्ध तथा पूजनीय होने का वरदान दिया

खाटू श्याम की पूजा प्रमुख रूप से किस भगवान के लिए होती है ?

खाटू श्याम की पूजा प्रमुख रूप से भगवान श्री कृष्ण के नाम की होती है जो बर्बरीक को अपना नाम देकर कलयुग में पूजनीय बनाया। खाटू श्याम को श्री कृष्ण का कलयुगी अवतार माना जाता है।

खाटू श्याम की पूजा किस दिन प्रमुख रूप से होती हैं ?

खाटू श्याम की पूजा प्रमुख रूप से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि या देवउठनी एकादशी के दिन मनाया जाता है क्योंकि इस दिन खाटू श्याम का जन्म उत्सव होता है

निष्कर्ष

दोस्तों, बात जहां पर आती है कि खाटू श्याम का इतिहास क्या है ? इस संबंध में हम अपने इस आर्टिकल में आपको एक विस्तृत जानकारी देने का प्रयास किया है खाटू श्याम प्रमुख रूप से भीम के पुत्र के पुत्र बर्बरीक थे जोकि श्री कृष्ण ने अपने नाम को देकर कलयुग में पूजनीय बनाया है खाटू नगर में होने के कारण इन्हें खाटू श्याम के नाम से जाना जाता है।

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